जिंदा थे तो किसी ने पास भी बिठाया नहीं
अब खुद मेरे चारो और बैठे जा रहे हैं
पहले कभी किसी ने मेरा हाल भी नहीं पुछा
अब सभी आंसू बहाये जा रहे है
एक रुमाल भी भेंट ना किया जब जिन्दा थे
और शाले और कपडे उपर से पहनाये जा रहे है
सब को पता है यह अब किसे के काम का नहीं
मगर फिर भी बेचारे दुनियादारी निभाय जा रहे है
किसी ने एक वक़्त का खाना नहीं खिलाया तब
अब सब घी पिलाये जा रहे है
ज़िन्दगी में तू एक कदम भी साथ न सका मेरे
अब फूलो में सज़ा कर अपने कंधो पे ले जा रहा है
अब पता चला मौत ज़िन्दगी से बेहतर है
तो बेवजय ही ज़िन्दगी की चाहत किये जा रहे है
गौरव कालरा
नाभा ,पंजाब
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