आधी रात के बाद रात की एक ऍसी घडी आती है जब तारो की पलकों पर भी खुमारी छा जाती है
सदा चलती रहने वाली हवा एकदम थम जाती है ,ना एक डाली हिलती है , न एक पता ,न एक तिनका डोलता है न एक किनका खिस्कता है ,
इस समय बड़ी से बड़ी पीड़ा भी शांत हो जाती है कड़ी से कड़ी चोट का दर्द जाता रहता है
बड़ी से बड़ी चिंता का पंजा ढीला हो जाता है ,बेचैन से बेचैन मरीज को चैन आ जाता है
दम्हे की भी आख लग जाती है , बिरहिन् के भी आंसू की लड़ी टूट जाती है
और महाकाली रात महाकाल की छाती पर सीर धरकर एक झपकी ले लेती है ---
----------------------------- वह घडी काल की गनना में नहीं आती
गौरव कालरा
रात के पहर पर
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